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Important facts about Gmail in Hindi? Gmail के बारे में कुछ रोचक तथ्य?

हेलो दोस्तों, आज के इस ब्लॉग में मै आपको GMAIL के बारे में कुछ रोचक तथ्य बताने वाला हूँ, जो शायद आपको पता हो, या नहीं भी सकते है| जीमेल गूगल का ही एक प्रोडक्ट है, जिसका उपयोग एक मैसेज को एक जगह से दूसरे जगह पहुंचाने के लिया किया जाता है|

जीमेल (Gmail) को गूगल(Google) मेल भी कहा जाता है | जीमेल इसका शार्ट नाम है| Gmail is an email client.

जीमेल(Gmail) को पब्लिक्ली पहली बार 2004 में announce किया गया था | हालांकि इसके शुरआती दौर में लोगो ने इसे मजाक समझा था | पर बाद में जब इसका उपयोग लोगो के बीच बढ़ा तब जाकर लोगो ने इसके महत्व को समझा |

जीमेल(Gmail) को यूज करने के लिए हमें इंटरनेट और कंप्यूटर की जरूररत पड़ती है | और आज कल हम अपने स्मार्ट फ़ोन और इंटरनेट की मदद से भी ईमेल भेज सकते है जीमेल की मदद से |

जीमेल(Gmail) गूगल द्वारा दी जाने वाली एक फ्री सर्विस है जिसका यूज करके आप अपने परिजनों, दोस्तों, ऑफिस कार्यकर्ताओ को अपना सन्देश आसानी से कुछ मिनटों में भेज सकते है , और जबाब में वो भी आपको उसका उत्तर बहुत जल्दी भेज सकते है |

इसकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसका यूज एक दम फ्री(Free) है , जिसका गूगल किसी से कोई चार्ज नहीं लेता | आपको सिर्फ अपना अकाउंट बनाना पड़ता है गूगल में और आप जीमेल का उपयोग चालू कर सकते हो |
यहाँ तक कि आप गूगल द्वारा दी जाने वाली और उत्पादों कि सुविधा का भी आनंद ले सकते है , जैसे कि गूगल ड्राइव, यूट्यूब इत्यादि |

जैसा कि मैंने आपको बताया गूगल आपसे अकाउंट बनाने और जीमेल(Gmail) को यूज करने का कोई पैसा नहीं लेता है | और वो आपको बहुत साडी साडी डाटा स्टोरेज मेमोरी देता है आपके मेल स्टोर करने के लिए जो कि गीगाबाईट्स में रहती है , जो कि एक नार्मल यूजर के लिए बहुत ज्यादा होती है | और उसे कभी ऐसी स्थिति का सामना नहीं करना पड़ता है कि उसका मेलबॉक्स फुल हो गया हो और वो अपना ईमेल रिसीव न कर पा रहा हो| but अगर किसी को जब ज्यादा ही स्टोरेज और ईमेल भेजने कि जरुरत पड़ती है तब गूगल उसका कुछ चार्ज लेता है | पर ये सब उनके लिए है, जो लोग गूगल को अपने बिज़नेस ईमेल कि तरह यूज करते है|

जीमेल(Gmail) के बारे में एक और रोचक तथ्य यह है कि , अगर आप जीमेल को 9 महीने लगातार यूज भी नहीं करते तब भी आपका अकाउंट डीएक्टिवेट नही होगा, वही ज्यादातर सर्विस में आपको 30 दिन के नादर एक बार लॉगिन जरूर करना पड़ता है , नहीं तो आपका अकाउंट डीएक्टिवेट कर दिया जाता है|

जीमेल(Gmail) के स्पैम टेक्नोलॉजी होती है जिससे कि वह स्पैम जैसे लगने वाले ईमेल को एक अलग स्पैम फोल्डर में रख देता है जिससे आपको उस मैसेज को पढ़ने कि जरुरत नहीं पढ़ती, हालांकि आप चाहे तो स्पैम फोल्डर के मैसेज रीड कर सकते है | यह आप पर डिपेंड करता है| कभी कभी सही मैसेज भी गलत फ्लैग मार्क्स होने के कारण स्पैम फोल्डर में चला जाता है |

जीमेल(Gmail) की मदद से आप ऑटो- रिप्लाई मैसेज भी सेट कर सकते हो | यह तब ज्यादा जरुरी हो जाता है जब आप जीमेल का उपयोग अपने बिज़नेस के लिए कर रहे हो | ऐसी स्थिति में जब आप हॉलीडे पर होते है तो आप एक जनरल रिप्लाई मैसेज सेट कर सकते है, जैसी कि ‘मै अभी ३ दिन के लिए अवकाश पर हूँ, और वापस आकर मै आपसे संपर्क करूँगा’ |

जीमेल(Gmail) पर आने वाले ईमेल को आप फ़िल्टर कर अलग अलग फोल्डर में रख सकते है| जैसे कि आप अपनी दो सर्विस अथवा प्रोडक्ट वेबसाइट चलाते है जिनका नाम ‘ABC’ और ‘XYZ’ है | ऐसी स्थिति में आप दोनों वेबसाइट के नाम से अलग फोल्डर क्रिएट कर सकते हो | और इससे आप दोनों वेबसाइट के लिए अलग अलग फोल्डर में ईमेल डाइवर्ट एकत्रित कर सकते हो| स्टार्टिंग में आपको थोड़ा मुश्किल हो सकती है पर बाद में सब सही हो जाता है | आप फोल्डर को अलग अलग कलर भी दे सकते हो, जिससे ईमेल को identify करना और भी आसान हो जाता है|

जीमेल(Gmail) से सम्बंधित कुछ और ब्लॉग जिन्हे आप पढ़ना चाहे, की लिंक नीचे दी हुई है |

जीमेल(Gmail) में प्रोफाइल पिक्चर और सिग्नेचर कैसे सेट करते है ?

जीमेल(Gmail) में लेबिल को बनाया और मैनेज कैसे किया जाता है ?

जीमेल(Gmail) SMTP सेटअप कैसे किया जाता है ?

जीमेल(Gmail) में ईमेल के पढ़े जाने या देखे जाने का पता कैसे चलता है ?

जीमेल(Gmail) के सारे कॉन्टेक्ट्स CSV फाइल में कैसे एक्सपोर्ट करते है ?

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Software Maintenance Issues & Problem in Hindi? सॉफ्टवेयर मेंटेनेंस मुद्दा और दिक्कते हिंदी में

हेलो दोस्तों, आज के इस ब्लॉग में मै आप सभी के साथ सॉफ्टवेयर मेंटेनेंस(Software Maintenance)के मुद्दे को डिसकस करने वाला हूँ| जैसा की आप सभी लोग जानते है कि, सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट लाइफ साइकिल का सबसे आखिरी फेज मेंटेनेंस(Software Maintenance)होता है जहा पर हमें सॉफ्टवेयर में होने वाले अपडेट और एक्सिस्टिंग फंक्शनलिटी में होने वाली प्रॉब्लम को सही करना पड़ता है | इस सॉफ्टवेयर मेंटेनेंस को हम कुछ हिस्सों में डिवाइड कर सकते है | सॉफ्टवेयर मेंटेनेंस(Software Maintenance)में होने वाले प्रमुख मुद्दे निम्नलिखित है |

इस सॉफ्टवेयर मेंटेनेंस को हम कुछ हिस्सों में डिवाइड कर सकते है | सॉफ्टवेयर मेंटेनेंस(Software Maintenance)में होने वाले प्रमुख मुद्दे निम्नलिखित है |

Issues in Software Maintenance:

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Issues In Software Maintenance

टेक्निकल: Technical

सॉफ्टवेयर मेंटेनेंस(Software Maintenance) के तहत यह सबसे प्रमुख मुद्दा है| टेक्निकल मुद्दा कुछ इन बातों पर depend करता है जैसे कि सिस्टम कि सिमित समझ, टेस्टिंग, इम्पैक्ट एनालिसिस, maintainability |

मैनेजमेंट: Management

मैनेजमेंट issue में include होता है , ओर्गनइजेशनल issue , स्टाफिंग प्रॉब्लम, प्रोसेस issue , ओर्गनइजेशनल स्ट्रक्चर, आउटसोर्सिंग |

कॉस्ट एस्टिमेशन: Cost Estimation

सॉफ्टवेयर मेंटेनेंस(Software Maintenance) प्रोसेस में यह एक बड़े और प्रमुख मुद्दों में से एक है | यह मुद्दा कॉस्ट और प्रोजेक्ट एक्सपीरियंस पर depend करता है|

सॉफ्टवेयर मेंटेनेंस मेज़रमेंट: Software maintenance measurement

सॉफ्टवेयर मेज़रमेंट फैक्टर जैसे कि साइज एफर्ट, schedule , क्वालिटी, understandability , रिसोर्स यूटिलाइजेशन, डिज़ाइन complexity , रिलायबिलिटी एंड फाल्ट टाइप डिस्ट्रीब्यूशन.

सॉफ्टवेयर मेंटेनेंस कि प्रमुख समस्याएं: Problems in Software Maintenance

सॉफ्टवेयर में जो भी बदलाव होते रहते है उनका ठीक तरह से डॉक्यूमेंटेशन नही किया जाता है| इसकी बजह से सॉफ्टवेयर के क्रमागत उन्नति को ट्रेस कर पाना मुश्किल हो जाता है जब सॉफ्टवेयर के बहुत सरे रिलीज़ अथवा versions आ जाते है| this cause creates problem in software maintenance.

कई बार तो सॉफ्टवेयर कि उस प्रोसेस का पता लगाना मुश्किल पड़ जाता है जिससे उसे बनाया गया था |

सॉफ्टवेयर मेंटेनेंस प्रोसेस में सबसे बड़ी मुश्किल तब होती है, जब हमें दूसरे के लिखे प्रोग्राम को समझना पड़ता है |
बहुत सरे सॉफ्टवेयर में बदलाव कि कोई गुंजाइस नहीं होती या फिर वो किसी बदलाव के लिए बनाये ही नहीं जाते| उन्हें तो सिर्फ रिडिजाइन किया जाता है |

सॉफ्टवेयर में unstructured कोड होते है |

जो मेंटेनेंस(Software Maintenance)करने वाले प्रोग्रामर होते है, उन्हें सिस्टम अथवा प्रॉब्लम डोमेन कि पूरी जानकारी ही नहीं होती.

सॉफ्टवेयर का प्रयाप्त डॉक्यूमेंटेशन नहीं होता|

ज्यादातर डेवेलपर्स को मेंटेनन्स(Software Maintenance)का काम ही पसंद नहीं होता|

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What is Requirement engineering in Hindi& Requirement analysis?रेक्विरेमेंट इंजीनियरिंग क्या होता है?

हेलो दोस्तों आज के इस ब्लॉग में मै आपको रेक्विरेमेंट इंजीनियरिंग(requirement engineering)और रेक्विरेमेंट एनालिसिस (Requirement Analysis)के बारे में बताने वाला हूँ | जो कि SDLC का पहला फेज होता है| इस फेज में सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट करने के लिए जानकारी एकत्रित करते है | रेक्विरेमेंट इंजीनियरिंग(requirement engineering) में principles का सिस्टेमेटिक यूज है |

इसमें techniques एवं tool है जो कि काम आते है एक कॉस्ट इफेक्टिव एनालिसिस के लिए | इसमें डॉक्यूमेंटेशन और यूजर की जरुरत है | सॉफ्टवेयर इंजीनियर एंड कस्टमर दोनों ही एक एक्टिव role अदा करते है इस रेक्विरेमेंट इंजीनियरिंग (requirement engineering) में | कहने का मतलब की रेक्विरेमेंट इंजीनियरिंग(requirement engineering) में दोनों की भागीदारी सक्रिय रहती है |

रेक्विरेमेंट इंजीनियरिंग(requirement engineering) क्या होता है?

रिक्वायरमेंट्स(requirement engineering)एक तरह से विस्तृत लेखा जोखा होता है सिस्टम की सर्विस का और कुछ बाध्यताओं का जो की रेक्विरेमेंट इंजीनियरिंग प्रोसेस के दौरान एकत्रित की जाती है |

रेक्विरेमेंट(requirement) क्या है ?

रेक्विरेमेंट(requirement) किसी सर्विस अथवा सिस्टम constraint की हाई लेवल abstract statement से डिटेल मैथमेटिकल functional specification तक रेंज कर सकती है |

रेक्विरेमेंट(requirement) को हमेशा इंटरप्रिटेशन के लिए ओपन होना ही चाहिए, और रेक्विरेमेंट हमेशा डिटेल में होनी चाहिए|

रेक्विरेमेंट(requirement) के प्रकार निम्नलिखित है

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Types of Requirement

यूजर रेक्विरेमटंस: User Requirement

यह यूजर के द्वारा दिए हुए स्टेटमेंट का कलेक्शन होता है, जिसमे ली जाने वाली सर्विस का डिस्क्रिप्शन भी होता है |

सिस्टम रिक्वायरमेंट्स: System Requirement

यह सिस्टम द्वारा दी जाने वाली सर्विस का विस्तृत वर्णन होता है | कुल मिलाकर यह क्लाइंट और कांट्रेक्टर के बीच का अनुबंध होता है |

सॉफ्टवेयर स्पेसिफिकेशन: Software Specification

यह सॉफ्टवेयर के डिज़ाइन और इम्प्लीमेंटेशन के बारे में डिटेल्ड जानकारी होती है जो की स्पेशली डेवेलपर्स के लिए उपलब्ध कराई जाती है|

रोल ऑफ़ रेक्विरेमेंट एनालिसिस: Role of requirement Analysis

रेक्विरेमेंट (requirement Analysis) एनालिसिस सिस्टम इंजीनियरिंग और सॉफ्टवेयर डिज़ाइन के बीच का फेज होता है |

रेक्विरेमेंट(requirement Analysis) एनालिसिस से हमें सॉफ्टवेयर स्पेसिफिकेशिन के बारे में जानकारी मिलती है |

रेक्विरेमटंस(requirement Analysis) एनालिसिस किस तरह से मददगार होता है?

एनालिस्ट : Analyst

रेक्विरेमेंट एनालिसिस एनालिस्ट के लिए बहुत बड़ी हेल्प होती उसे सॉफ्टवेयर एलोकेशन को refine करने में, इसी एनालिसिस के बेस पर एनालिस्ट कई प्रकार के सॉफ्टवेयर मॉडल्स डिफाइन करता है जैसे कि ‘डाटा मॉडल्स’ , ‘फंक्शनल मॉडल’, ‘बिहेवियरल मॉडल’ |


डिज़ाइनर: Designer

रेक्विरेमेंट को एनालिसिस करने के बाद ही डिज़ाइनर डाटा आर्किटेक्चरल इंटरफ़ेस और कॉम्पोनेन्ट लेवल डिज़ाइन कर सकता है |

डेवलपर: Developer

रेक्विरेमेंट स्पेसिफिकेशनऔर डिज़ाइन कम्पलीट होने के बाद ही सॉफ्टवेयर डेवेलप होना चालू जो सकता है |

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White Box Testing in Hindi? वाइट बॉक्स टेस्टिंग क्या है हिंदी में?

हेलो दोस्तों आजके इस ब्लॉग में मै आपको वाइट बॉक्स टेस्टिंग(white Box Testing) के बारे में बताने जा रहा हूँ | वैसे अगर अप्प टेक्निकल फील्ड से है तो टेस्टिंग के बारे में जरूर जानते होंगे या सुना तो जरूर होगा| अगर अपने नहीं भी पढ़ा और सुना है तो कोई चिंता की बात नहीं | हम यहाँ आपको सब कुछ बताएँगे टेस्टिंग के बारे में |

टेस्टिंग(testing) एक सामान्य शब्द है जिसका मतलब होता है किसी भी चीज़ का परिछण करना या फिर उसे चेक करना| यह चेकिंग एक्सटर्नल और इंटरनल दोनों तरह से हो सकती है | जैसे की उदाहरण के लिए, जैसे की गर्मी के सीजन में जब हम कूलर खरीदने के लिए जाते है तो सबसे पहले हम उसकी बॉडी देखते है की मजबूत है की नहीं या फिर कही से टूटी फूटी तो नहीं, यह हो जाती है |

बाहरी टेस्टिंग और फिर हम उस कूलर का मोटर और फैन चला कर चेक करते है या फिर कहे कि हम उसकी मेन वर्किंग टेस्ट करते है | और अगर सब कुछ सही होता है तो हम उस कूलर को खरीद लेते है | The concept of white box testing is also related with this example.

बस कुछ इसी तरह सॉफ्टवेयर के केस में भी होता है | वाइट बॉक्स टेस्टिंग (white Box Testing) उसका एक प्रकार है जिसका विवरण निम्नलिखित है|

वाइट बॉक्स टेस्टिंग (white Box Testing) एक ऐसी टेस्टिंग प्रक्रिया है, जिसमे सॉफ्टवेयर और सॉफ्टवेयर प्रोसीजर का बहुत बारीकी से अवलोकन किया जाता है | इस वाइट बॉक्स टेस्टिंग (white Box Testing) को गिलास बॉक्स टेस्टिंग(Glass Box Testing) भी कहा जाता है|

वाइट बॉक्स टेस्टिंग (white Box Testing) में जो टेस्ट केस बनते है वो निम्नलिखित चीज़ो को पता अथवा examine करने के लिए बनते है|

सभी independent path का examine करने के लिए जो की मॉड्यूल का हिस्सा है|


सभी logical path को देखना और उनके सही या गलत होने का पता लगाना |


सभी लूप को चेक करना एक सिमित दायरे में रह कर और उनके operational सीमा के अंदर|

हमें वाइट बॉक्स टेस्टिंग (white Box Testing) की जरुरत क्यों होती है?


वाइट बॉक्स टेस्टिंग (white Box Testing) को परफॉर्म करने तीन प्रमुख कारण निम्नलिखित है|

एक केस यह हो सकता है कि प्रोग्राम को डिज़ाइन और इम्प्लीमेंट करते टाइम प्रोग्रामर ने कोई गलत assumption किये हो, जिसके कारण से प्रोग्राम में लॉजिकल errors हो सकती है | ऐसी लॉजिकल errors को डिटेक्ट करना और उन्हें सही करने के लिए हमें पुरे प्रोसीजर कि डिटेल्स को examine करना जरुरी है | इसलिए ऐसी सिचुएशन में हमें वाइट बॉक्स मॉडल (white Box Testing) का यूज करना पड़ता है |

फ्लो ऑफ़ कंट्रोल और डाटा को लेकर प्रोग्रामर किये गए assumption के कारण कभी कभी डिज़ाइन में errors हो सकती है | ऐसी स्थिति में वाइट बॉक्स मॉडल (white Box Testing) का यूज करना बहुत ही जरुरी हो जाता है|

ऐसी बहुत सी टाइपोग्राफ़िकल गलतिया हो सकती है, जिन्हे सिंटेक्स एंड टाइप चेकिंग प्रोसेस से गुजरने के बाद भी नहीं पकड़ा जा सका | ऐसी गलतिया वाइट बॉक्स (white Box Testing) चेकिंग के दौरान दूर हो सकती है|

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Compare and contrast the important life cycle models in Hindi: लाइफ साइकिल मॉडल्स इन हिंदी 2019?

हेलो दोस्तों इस ब्लॉग में मै आपको सॉफ्टवेयर लाइफ साइकिल मॉडल्स(life cycle models) के बीच में डिफरेंस बताने जा रहा हूँ| जिससे आप इन सभी सॉफ्टवेयर को बनाने की लिए यूज होने वाले लाइफ साइकिल मॉडल्स(life cycle models) के बीच का अंतर बहुत अच्छे से समझ पाएंगे| यह डिफरेंस हम एक टेबल बनाकर बता रहे है जिससे की आपको तुरंत कम्पेयर करने में आसानी होगी|

Waterfall ModelSpiral ModelPrototype ModelIncremental model
In this life cycle models रिक्वायरमेंट्स को बहुत अच्छे से समझा ही जाना चाहिए और शुरुआत में ही डिफाइन होना चाहिए इस मॉडल (life cycle models) में रेक्विरेमेंट अक्सर ही बदल जाती है हर एक चक्कर कम्पलीट होने के साथ इसलिए हम रेक्विरेमेंट कलेक्ट करने और एनालिसिस का काम हर चक्कर में कर सकते है |इस मॉडल(life cycle models) में रिक्वायरमेंट्स एंड एनालिसिस हम बाद की स्टेज में भी कर सकते है डेवलपमेंट प्रोसेस के दौरान क्योकि इस मॉडल में रेक्विरेमन्ट्स अक्सर चेंज हो जाती है|इस मॉडल (life cycle models) में रिक्वायरमेंट्स एंड एनालिसिस डेवलपमेंट साइकिल की बाद की स्टेज में बनाई जा सकती है |
इस टाइप के प्रोसेस मॉडल के लिए हमें ऐसी डेवलपमेंट टीम चुन्नी चाहिए जिसे इसी तरह के प्रोजेक्ट का पर्याप्त अनुभव हो | ऐसी डेवलपमेंट टीम जिसे इस जैसे प्रोजेक्ट के काम का कम एक्सपीरियंस होता है, उसे भी इस प्रोसेस मॉडल में काम करने की अनुमति मिल सकती है |ऐसी डेवलपमेंट टीम जिसे इस जैसे प्रोजेक्ट का कम एक्सपीरियंस होता है, उसे भी इस प्रोसेस मॉडल में काम करने की अनुमति है |इस टाइप के प्रोसेस मॉडल के लिए हमें ऐसी डेवलपमेंट टीम चुन्नी चाहिए जिसे इसी तरह के प्रोजेक्ट का पर्याप्त अनुभव हो |
इस पूरी प्रोसेस में यूजर का कोई भी इन्वॉल्वमेंट नहीं है |डेवलपमेंट प्रोसेस के सभी फेज में यूजर का कोई भी इन्वॉल्वमेंट नहीं होता|इस मॉडल की डेवलपमेंट प्रोसेस के हर फेज में यूजर का इन्वॉल्वमेंट है|डेवलपमेंट प्रोसेस की हर फेज में यूजर का इन्वॉल्वमेंट होता है |
जब रेक्विरेमेंट बहुत अच्छे से पता हो और डेवलपमेंट भी एक लीनियर एफर्ट के लिए सलाह दे तब हमें वॉटरफॉल मॉडल (life cycle models) चुनना चाहिए |चूकि इस मॉडल का नेचर iterative होने के कारन इस में आने वाली सभी रिस्क को पहले ही पता करके सही कर लिया जाता है, इससे पहले की वो कोई प्रॉब्लम कड़ी करे| इसलिए इस मॉडल (life cycle models) को ऐसे प्रोजेक्ट के लिए यूज किया जाता है जहा रियल टाइम प्रॉब्लम होने के चांस ज्यादा हो|जब कोई डेवलपर किसी अल्गोरिथम की एफिशिएंसी पर कॉंफिडेंट न हो या फिर ऑपरेटिंग सिस्टम की अडाप्टेबिलिटी पर तब इस मॉडल (life cycle models) का चयन सॉफ्टवेयर को डिज़ाइन करने के लिए किया जाता है|जब रेक्विरेमेंट अच्छी तरह से पता हो और डेवलपमेंट एफर्ट एक प्योर लीनियर एफर्ट की सलाह देता हो और जब हमें एक सॉफ्टवेयर फंक्शनलिटी के लिमिटेड सेट की जल्दी जरुरत हो तब इंक्रीमेंटल मॉडल (life cycle models) को यूज किया जाता है|

इस ब्लॉग को लेकर आपके मन में कोई भी प्रश्न है तो आप हमें इस पते a5theorys@gmail.com पर ईमेल लिख सकते है|

आशा करता हूँ, कि आपने इस पोस्ट ‘software development life cycle models’को खूब एन्जॉय किया होगा|

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What is Spiral Model In Hindi? स्पाइरल मॉडल क्या है?

हेलो दोस्तों, इस ब्लॉग में मै आपको सॉफ्टवेयर बनाने के लिए यूज होने वाले मॉडल के बारे में बताने जा रहा हूँ, जिसका नाम स्पाइरल मॉडल(Spiral Model) है| इस मॉडल का यूज भी सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट के लिए किया जाता है|

इस (Spiral Model) मॉडल का नेचर भी प्रोटोटाइप मॉडल जैसा iterative होता है जिसमे एक बड़े सिस्टम को छोटे छोटे पार्ट्स में डिवाइड कर लेते है और उसमे इम्प्लीमेंट एंड टेस्टिंग करते रहते है| और यह मॉडल लीनियर sequential मॉडल की तरह controlled और systematic होता है |

इस स्पाइरल मॉडल (Spiral Model) के द्वारा बनाये गए सॉफ्टवेयर बहुत ही efficient इंक्रीमेंटल versions होते है किसी भी सॉफ्टवेयर के| और इस मॉडल के द्वारा सॉफ्टवेयर को इंक्रेमेन्ट्स की एक सीरीज में डेवेलोप किया जाता है|

स्पाइरल मॉडल (Spiral Model) बहुत सारी framework activities में डिवाइड रहता है| और इन फ्रेमवर्क एक्टिविटीज को टास्क regions के द्वारा denote किया जाता है|
ज्यादातर इसमें six टास्क regions होते है जैसा की आप निचे दिए हुए चित्र में देख सकते है|

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SPIRAL MODEL

स्पाइरल मॉडल (Spiral Model) एक बड़े पैमाने पर सॉफ्टवेयर सिस्टम को बनाने की एक realistic एप्रोच होती है| क्योकि डेवलपर और कस्टमर दोनों ही प्रोब्लेम्स को बहुत अच्छे तरीके से समझते है हर लेवल पर | और इस तरह जो भी रिस्क अथवा प्रॉब्लम होती है उन्हें हर लेवल पर पता करके सही कर लिए जाता है|

इस (Spiral Model) मॉडल के अंतर्गत शुरुआत में एक प्रोडक्ट स्पेसिफिकेशन का निर्माण होता है| और उसके बाद वाले चरण में एक प्रोटोटाइप का डेवलपमेंट होता है| और सबसे अंत में एक बहुत ही उम्दा सॉफ्टवेयर का निर्माण होता है|

प्लानिंग फेज में हम सॉफ्टवेयर का schedule एंड cost को हम प्लान कर सकते है और उसे एडजस्ट भी कर सकते है कस्टमर के द्वारा दिए गए फ़ीडबैक्स से| स्पाइरल मॉडल (Spiral Model) में प्रोजेक्ट एंट्री पॉइंट axis डिफाइन होता है| और यह axis पॉइंट बहुत सरे प्रोजेक्ट्स के स्टार्टिंग पॉइंट को दर्शाती है|

For Instance : कांसेप्ट डेवलपमेंट प्रोजेक्ट स्पाइरल के कोर से स्टार्ट होगा और स्पाइरल के पाथ के साथ जारी रहेगा| अगर कांसेप्ट को एक्चुअल प्रोजेक्ट में डेवेलप करना पड़ता है तब एंट्री पॉइंट 2 पर प्रोडक्ट डेवलपमेंट प्रोसेस स्टार्ट होती है| अतः इस एंट्री पॉइंट 2 को हम प्रोडक्ट डेवलपमेंट प्रोजेक्ट एंट्री पॉइंट भी कहते है| और प्रोडक्ट के डेवलपमेंट को हम कई चरण में लेते है|

टास्क regions को describe करने की विधि निम्नलिख्ति है|

कस्टमर कम्युनिकेशन: Customer communication

इस रीजन में कस्टमर से बात चीत करने पर जोर दिया गया है|

प्लानिंग: Planning

प्लानिंग के तहत सभी रिसोर्सेज की टाइम लाइन और अन्य सभी प्रोजेक्ट रिलेटेड एक्टिविटीज को निर्धारित करने के लिए कहा गया है|

रिस्क-एनालिसिस: Risk Analysis


इस फेज में टेक्निकल और मैनेजमेंट की रिस्क को देखा और परखा जाता है|

इंजीनियरिंग: Engineering


इस रीजन में एप्लीकेशन के एक या एक से अधिक रिप्रजेंटेशन बनाये जाते है|

कंस्ट्रक्ट एंड रिलीज़: Construct and release

इस टास्क रीजन में वो सभी टास्क जो की जरुरी होती है कंस्ट्रक्शन के लिए, टेस्टिंग के लिए, एंड एप्लीकेशन को इनस्टॉल करने के लिए और चलने के लिए | कुछ टास्क जो की यूजर सपोर्ट के लिए जरुरी होती है वो भी इसी टास्क रीजन में होती है|

कस्टमर इवैल्यूएशन: Customer Evaluation

जो कस्टमर फीडबैक होता है उसे हम कस्टमर के द्वारा प्राप्त करते है जब कस्टमर एप्लीकेशन को evaluate करता है और चला कर देखता है | और यह सब प्रोसेस इंस्टालेशन स्टेज में होती है जब एप्लीकेशन को इनस्टॉल किया जाता है|

प्रत्येक रीजन में कई सारी वर्क tasks होती है जिनका क्रियान्वन प्रोजेक्ट की characteristic पर देपेंद करता है| जैसे की एक छोटे प्रोजेक्ट के लिए बहुत थोड़े वर्क टास्क उसे किये जाते है| और एक बड़े और काम्प्लेक्स प्रोजेक्ट के लिए एक बड़ी मात्रा में वर्क टास्क यूज किये जा सकते है|

स्पाइरल मॉडल में सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग की टीम स्पाइरल के चारो तरफ घडी की दिशा में घूमती है स्पाइरल के कोर से शुरू करते हुए|

एडवांटेज ऑफ़ स्पाइरल मॉडल: Advantage of Spiral Model

स्पाइरल मॉडल में अगर requirement चेंज होती है तो उसे हम किसी भी स्टेज में चेंज कर सकते है |

प्रोजेक्ट में आने वाली रिस्क को पहले ही पता करके सही कर दिया जाता है इसे पहले की वो कोई प्रॉब्लम खड़ी करे

ड्रॉबैक्स ऑफ़ स्पाइरल मॉडल: Drawbacks of Spiral Model

इस मॉडल का जो बेस पॉइंट है है वो है कस्टमर के साथ कम्युनिकेशन, अगर कम्युनिकेशन सही नहीं हुआ तो फिर बनने वाला सॉफ्टवेयर निर्धारित माप दंड पर खरा नहीं उतरेगा|
यह मॉडल प्रोजेक्ट में आने वाली हर रिस्क को पता करके रखता है अथवा खोज के रखता है और अगर यह सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट में जोखिम को पता करने का काम प्रॉपरलय किया जाता है तब जाके हम एक सफल प्रोडक्ट प्राप्त कर पाएंगे|

इस ब्लॉग को लेकर आपके मन में कोई भी प्रश्न है तो आप हमें इस पते a5theorys@gmail.com पर ईमेल लिख सकते है|

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Rapid Application Development Model in Hindi (RAD Model)? रेड मॉडल क्या है ?

हेलो दोस्तों, इस ब्लॉग में मै आपको रैपिड एप्लीकेशन डेवलपमेंट मॉडल(RAD Model) के बारे में बताने वाला हूँ| यह भी सॉफ्टवेयर सिस्टम को बनाने का एक मॉडल अथवा प्रोसीजर है|

रैपिड एप्लीकेशन डेवलपमेंट मॉडल(RAD Model) इंक्रीमेंटल सॉफ्टवेयर प्रोसेस अथवा इंक्रीमेंटल मॉडल का एक टाइप है| इस मॉडल की डेवलपमेंट प्रक्रिया बहुत ही छोटी होती है|

यह मॉडल वाटरफाल मॉडल के जैसे ही है| जिसमे हम कॉम्पोनेन्ट कंस्ट्रक्शन की मदद से बड़ी तीव्रता से डेवलपमेंट कर लेते है| बहुत काम समय में रैपिड एप्लीकेशन मॉडल(RAD Model) का यूज करके एक पूरी तरह से फंक्शनल सिस्टम बनाने के लिए और प्रोजेक्ट को सीमित रखने के लिए हमें सॉफ्टवेयर की रेक्विरेमेंट अथवा जरुरत को अच्छी तरह से समझना होगा

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RAD(Rapid Application Model)

RAD मॉडल के फेज : Various Phases of RAD Model

बिज़नेस मॉडलिंग: Business Modeling

बिज़नेस मॉडल में इनफार्मेशन का फ्लो बनता है बहुत सरे छोटे छोटे बिज़नेस फंक्शन में| और ये बिज़नेस फंक्शन निम्नलिखित सूचना इक्कठी करते है |

सूचना जिससे बिज़नेस प्रक्रिया का प्रवाह बनता है|(Information that derives the business process)

सूचना के कई प्रकार जो की उत्पन्न होते है|(The types of information being generated)

सूचना का स्रोत (The generator of information)

सूचना का प्रवाह (The Information flow)

सूचना का प्रोसेसर(The processor of information)

डाटा मॉडलिंग: Data Modeling


इस फेज में जो इनफार्मेशन बिज़नेस मॉडल से उत्पन्न होती है उसे क्लासिफाइड किया जाता है डाटा ऑब्जेक्टस में | डाटा ऑब्जेक्ट्स की विशेषताए Identified की जाती है | और कई डाटा ऑब्जेक्ट्स के आपस के रिलेशन को ज्ञात किया जाता है |

प्रोसेस मॉडलिंग: Process Modeling

इस फेज में जितने भी डाटा ऑब्जेक्ट्स होते है उन्हें प्रोसेस में परिवर्तित किया जाता है| यह प्रोसेसेज डाटा ऑब्जेक्ट्स से इनफार्मेशन निकालने के लिए और बिज़नेस फंक्शन को इम्प्लीमेंट करने के लिए रेस्पोंसिबल होती है|


एप्लीकेशन जनरेशन: Application Generation

एक सॉफ्टवेयर को बनाने के लिए बहुत सरे ऑटोमेशन टूल्स का यूज किया जा सकता है, रेड भी रईयूसाबले कॉम्पोनेन्ट का यूज करता है अथवा वो रेसुअबले कॉम्पोनेन्ट बनता है जो की रैपिड डेवलपमेंट कर सके किसी सॉफ्टवेयर का |


टेस्टिंग एंड टर्नओवर : Testing and Turnover

जैसा की हमने पहले पढ़ा है की RAD reusable component का यूज करता है जिससे की टेस्टिंग का ओवरहेड और एफर्ट काम हो जाता है | पर अगर सॉफ्टवेयर में कोई नया कॉम्पोनेन्ट जोड़ा जाता है तो उसकी टेस्टिंग की जरुरत होती है | सभी इंटरफ़ेस को बराबरी से टेस्ट करना महत्ववूर्ण है|

ड्रॉबैक्स ऑफ़ रैपिड एप्लीकेशन डेवलपमेंट: Drawbacks of rapid application Development model (RAD) ?


इस रैपिड एप्लीकेशन मॉडल(RAD Model) में एक बड़ी टीम और बहुत सारे लोगो की जरुरत पड़ती है एक स्केलेबल प्रोजेक्ट के लिए |

इस रैपिड डेवलपमेंट मॉडल (RAD Model) में बहुत ज्यादा कमिटेड डेवेलपर्स और कस्टमर्स की जरुरत पड़ती है | और अगर कमिटमेंट में कुछ कमी होती है तो यह रेड मॉडल fail हो सकता है|

इस रैपिड डेवलपमेंट (RAD Model) मॉडल के तहत बनने वाले प्रोजेक्ट्स में बहुत हैवी रिसोर्सेज की जरुरत होती है|

जहा पर पर्याप्त मॉडुलरिज़शन(Modularized) नहीं होता वह पर यह मॉडल फेल हो जाता है| ऐसे प्रोजेक्ट्स के लिए परफॉरमेंस एक प्रॉब्लम बन जाती है|
ऐसे प्रोजेक्ट्स जो की रेड मॉडल यूज कर रहे है उनके लिए नयी टेक्नोलॉजी अडॉप्ट करना मुश्किल हो जाता है|

किन किन परिस्थिति में रैपिड डेवलपमेंट मॉडल (RAD Model) का यूज किया जाता है? When do we need to use RAD(Rapid application model)?

रैपिड डेवलपमेंट मॉडल (RAD Model) उपर्युक्त है सूचना तंत्र से सम्बंधित एप्लीकेशन बनाने के लिए, बिज़नेस एप्लीकेशन बनाने के लिए, और ऐसे सारे सिस्टम जिन्हे निम्नलिखित तरीको से मॉडुलरिजे(Modularize) किया जा सके|

यह मॉडल बिलकुल वॉटरफॉल मॉडल जैसा है लेकिन यह बहुत छोटी डेवलपमेंट साइकिल रखता है|

यह कॉम्पोनेन्ट बेस्ड कंस्ट्रक्शन यूज करता है | और reuse और कोड जनरेशन पर जोर देता है |

यह मॉडल बहुत सारी टीम का उपयोग करता है स्केलेबल प्रोजेक्ट्स के लिए|


यह मॉडल उन प्रोजेक्ट्स के लिए बहुत ही अच्छा है जहा पर टेक्निकल रिस्क बहुत कम होती है|
रैपिड डेवलपमेंट मॉडल में हैवी रिसोर्सेज की जरुरत पड़ती है|

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Incremental Model in Software Engineering? इंक्रीमेंटल मॉडल क्या होता है?

हेलो दोस्तों, इस ब्लॉग में मै आपको इंक्रीमेंटल मॉडल(Incremental Model) के बारे में बताने वाला हूँ, जिसका उपयोग सॉफ्टवेयर सिस्टम को बनाने में होता है| इंक्रीमेंटल मॉडल (Incremental Model) में वो सारी फेज होती है जो कि वाटरफॉल मॉडल में होती है| लेकिन इंक्रीमेंटल मॉडल का नेचर iterative होता है| इंक्रीमेंटल मॉडल के फेज निम्नलिखित है|

एनालिसिस(Analysis)
डिज़ाइन(Design)
कोड(Code)
टेस्ट(Test)

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The Incremental Model

इंक्रीमेंटल मॉडल (Incremental Model) कस्टमर्स को सॉफ्टवेयर रिलीज़ कि एक सीरीज उपलब्ध करवाता है| और इन रिलीज़ को हम इन्क्रीमेंट भी कहते है| हर इन्क्रीमेंट के साथ ज्यादा ज्यादा फंक्शनलिटी जुड़ी रहती है|

सबसे पहले इन्क्रीमेंट को हम कोर प्रोडक्ट कहते है| इस रिलीज़ में बेसिक रेक्विरेमेंट को पूरा किया जाता है, और फिर इसके बाद वाले इंक्रेमेन्ट्स में हम और सारी रिक्वायरमेंट्स जोड़ते जाते है|

वर्ड प्रोसेसिंग सॉफ्टवेयर को इस इंक्रीमेंटल मॉडल (Incremental Model) का एक उदाहरण माना जा सकता है| जिसके पहले इन्क्रीमेंट में केवल डॉक्यूमेंट प्रोसेसिंग की सुविधा रहती है| और इसके बाद इसके दूसरे इन्क्रीमेंट में और भी जटिल डॉक्यूमेंट की प्रोसेसिंग और फाइल को मैनेज करने का सिस्टम दिया गया| और इसके अगले इन्क्रीमेंट में स्पेलिंग एंड ग्रामर चेकिंग सुविधा दी गयी| तो कुलमिलाकर इस इंक्रीमेंटल मॉडल (Incremental Model) में हर रिलीज़ के साथ कुछ और फंक्शन और सुविधा को जोड़ा जाता है जिससे की यूजर का काम और भी आसान हो जाये|

हमें इस इंक्रीमेंटल मॉडल (Incremental Model) का चयन कब करना चाहिए?

जब सभी रिक्वायरमेंट्स पूरी और सही तरह से डिफाइन की गयी हो|
जब सिर्फ केवल लीनियर एफर्ट की जरुरत हो किसी भी सॉफ्टवेयर को डेवेलोप करने के लिए|
जब सिमित सॉफ्टवेयर फंक्शनलिटी की तुरंत जरुरत हो|

मेरिट्स ऑफ़ इंक्रीमेंटल मॉडल: Merits of Incremental Model

जब हमारे पास प्रोजेक्ट में काम करने के लिए कम लोग उपलब्ध हो, तब हम इस इंक्रीमेंटल मॉडल (Incremental Model) को यूज कर सकते है|
किसी भी तरह की टेक्निकल रिस्क को हर इन्क्रीमेंट के साथ मैनेज किया जा सकता है|
बहुत थोड़े समय के लिए पर हम कोर प्रोडक्ट कस्टमर को डिलीवर कर सकते है|

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Waterfall model(वॉटरफॉल मॉडल ) is not used in making bigger software system in Hindi?

हेलो दोस्तों, आज के इस ब्लॉग में बताने वाला हूँ कि, वॉटरफॉल मॉडल(waterfall model) का उपयोग बड़े सॉफ्टवेयर सिस्टम को बनाने के लिए क्यों नहीं किया जाता है?

वॉटरफॉल मॉडल (waterfall model) एक लीनियर सेकेंसिअल(Linear Sequential Model) मॉडल है जिसे सॉफ्टवेयर डेवेलप करने के लिए यूज किया जाता है| पर इस मॉडल का यूज हम बड़े सॉफ्टवेयर सिस्टम को बनाने के लिए नहीं करते, इसके पीछे दो प्रमुख रीज़न है, जो की निम्नलिखित है|

जैसा की हम जानते है की एक सॉफ्टवेयर को बनाने में उसकी हर एक फेज में एक रिस्क रहता है कि कि सॉफ्टवेयर में कुछ गलत न हो जाये | या उसकी फंक्शनिंग में कुछ गड़बड़ी न आ जाये| और सॉफ्टवेयर बनाने कि यही रिस्क वॉटरफॉल मॉडल (waterfall model) द्वारा कवर नहीं करि जा सकती, क्योकि वॉटरफॉल मॉडल में हम तब तक कोई त्रुटि नहीं पकड़ सकते जब तक कि हम अंतिम फेज टेस्टिंग में न पहुंच जाये |

और अगर waterfall model के टेस्टिंग फेज में कोई मिस्टेक सामने आती है तो फिर हमें वापिस से पीछे वाले फेज में जा के उसे देखना और सही करना पड़ेगा| इस प्रकार हमें अपने किये गए एक्शन को रिवर्स करना पड़ता है और इस प्रक्रिया को करने में बहुत समय बर्बाद होता है|

दूसरा मुख्य रीज़न जिसके कारन वाटरफॉल मॉडल (waterfall model) को बड़े सॉफ्टवेयर सिस्टम बनाने के लिए यूज़ नहीं किये जाता है उसका कठोर होना| इसके कारन सॉफ्टवेयर को बनाने कि प्रोसेस में कई मुश्किल होती है जिसे हम “ब्लॉकिंग स्टेट्स इन सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट प्रोसेस ” भी कहते है|

सॉफ्टवेयर डेवेलप करने वाले कुछ टीम मेंबर को इंतज़ार करना पड़ता है जब तक पहली वाली फेज में काम ख़तम न हो जाये| क्योकि उनका काम उस फेज पर डिपेंड करता है, और उससे पहले वो अपने फेज का काम चालू नहीं कर सकते| इस सब के कारन प्रोजेक्ट में डिले होता है और रिसोर्सेज की बर्बादी होती है क्योकि कुछ रिसोर्सेज कुछ टाइम के लिए खाली बैठे रहते है जब तक की उनसे पहली वाली फेज का काम खत्म न हो जाये|

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Difference between waterfall and prototype Model in Hindi: वॉटरफॉल मॉडल और प्रोटोटाइप मॉडल में अंतर

इस ब्लॉग में आपको मै वॉटरफॉल मॉडल(waterfall model) और प्रोटोटाइप मॉडल(Prototype Model) में अंतर बताने वाला हूँ(Difference between waterfall and prototype model), ये दोनों ही सॉफ्टवेयर को बनाने की प्रक्रिया है| And used in software development life cycle(HDLC).

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WATERFALL MODEL VS PROTOTYPE MODEL

वॉटरफॉल मॉडल और प्रोटोटाइप मॉडल में अंतर : difference between waterfall and prototype model

वॉटरफॉल मॉडल (waterfall model) का उपयोग तब किया जाता है जब सॉफ्टवेयर को बनाने कि सारी जानकारी सुरु में ही कलेक्ट हो जाये, और सॉफ्टवेयर की जरुरत और रेक्विरेमेंट को अच्छी तरह से समझ लिया जाये|

प्रोटोटाइप मॉडल (Prototype Model) का यूज तब किया जाता है जब हमें सॉफ्टवेयर के बारे में पूरी जानकारी ना हो और हमें उसकी टेक्निकल प्रोब्लेम्स के बारे में भी ज्यादा पता ना हो|

वॉटरफॉल मॉडल (waterfall model) में सॉफ्टवेयर का फाइनल प्रोडक्ट कस्टमर को लास्ट में दिया जाता है जब सारा काम कम्पलीट हो जाता है|

प्रोटोटाइप मॉडल (Prototype Model) में सॉफ्टवेयर हर फेज में कस्टमर को दे दिया जाता है टेस्टिंग पर्पज से जिसे ट्राई करके कस्टमर अपना अप्रूवल देते है|

वॉटरफॉल मॉडल (waterfall model) हमेशा छोटे सॉफ्टवेयर सिस्टम के लिए यूज किया जाता है|

प्रोटोटाइप मॉडल (Prototype Model) बड़े सिस्टम को बनाने में काम आता है|

वॉटरफॉल मॉडल (waterfall model) में सॉफ्टवेयर को बनाने की पूरी प्रक्रिया में डेवेलपर्स ही सम्लित होते है , इसमें सॉफ्टवेयर बनने तक यूजर्स का कोई रोल नहीं होता|

प्रोटोटाइप मॉडल (Prototype Model) में डेवेलपर्स और यूजर दोनों ही सॉफ्टवेयर सिस्टम को बनाने में सम्लित होते है|

वॉटरफॉल मॉडल (waterfall model) में ऎसे कॉम्पोनेन्ट का कोई उपयोग नहीं होता जिन्हे हम दुबारा यूज कर सकते है|

प्रोटोटाइप मॉडल (Prototype Model) में हम ऎसे कॉम्पोनेन्ट(रियूजेबल) का उसे कर सकते है एक नया प्रोटोटाइप मॉडल बनाने के लिए|

So, this was the all about difference between waterfall and prototype model

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आशा करता हूँ, कि आपने इस वॉटरफॉल मॉडल (waterfall model) vs प्रोटोटाइप मॉडल (Prototype Model) पोस्ट को खूब एन्जॉय किया होगा|

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